Friday, October 16, 2026
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ग्रेटर नोएडा में रामलीला: सीता स्वयंवर से श्रीराम वनवास तक, भावुक हुए दर्शक

शिव धनुष भंग के बाद श्रीराम और माता सीता का विवाह, जनकपुर से अयोध्या तक गूंजे जयकारे

कैकई-मंथरा संवाद के बाद श्रीराम के वनवास का मंचन, श्रद्धालुओं की आंखें हुईं नम

ग्रेटर नोएडा। ग्रेटर नोएडा रामलीला में 16 अक्टूबर 2026 को श्री धार्मिक रामलीला कमेटी द्वारा आयोजित भव्य रामलीला एवं दशहरा महोत्सव में सीता स्वयंवर, भगवान श्रीराम और माता सीता के विवाह, माता सीता की विदाई तथा श्रीराम वनवास की लीलाओं का भावपूर्ण मंचन किया गया। इन प्रसंगों ने दर्शकों को कभी हर्ष और उल्लास से भर दिया, तो कभी भावुक कर दिया। भगवान श्रीराम और माता सीता के जयकारों से पूरा रामलीला परिसर गूंज उठा।

परम श्रद्धेय गोस्वामी सुशील जी महाराज के दिशा-निर्देशन और युवा अध्यक्ष श्री आनंद भाटी के मार्गदर्शन में श्री धार्मिक रामलीला का मंचन किया जा रहा है। आयोजकों के अनुसार, रामलीला एवं दशहरा महोत्सव 11 अक्टूबर से 20 अक्टूबर 2026 तक प्रतिदिन शाम 7 बजे आयोजित किया जा रहा है। इस आयोजन का उद्देश्य धार्मिक परंपराओं को जीवंत बनाए रखने के साथ-साथ नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति, मर्यादा, पारिवारिक मूल्यों और आदर्श जीवन की शिक्षा देना भी है।

सीता स्वयंवर में शिव धनुष भंग का अद्भुत मंचन

भगवान श्रीराम और माता सीता के विवाह प्रसंग ने मोहा मन

संस्था के अध्यक्ष श्री आनंद भाटी ने बताया कि रामलीला के छठे दिन की लीला में माता सीता के स्वयंवर का मंचन किया गया। महाराज जनक ने स्वयंवर में शर्त रखी थी कि जो भी शिव धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा, उसी के साथ उनकी पुत्री सीता का विवाह होगा।

इस स्वयंवर में अनेक राजा-महाराजा और पराक्रमी योद्धा शामिल हुए। सभी ने शिव धनुष उठाने और उस पर प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास किया, लेकिन कोई भी धनुष को हिला तक नहीं सका। एक के बाद एक योद्धाओं के असफल होने से महाराज जनक निराश हो गए।

महाराज जनक की निराशा देखकर भगवान लक्ष्मण को बहुत दुख हुआ। उन्होंने अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए कहा कि रघुवंशी अभी जीवित हैं। इसी बीच महर्षि विश्वामित्र ने भगवान श्रीराम को शिव धनुष उठाने की आज्ञा दी।

भगवान श्रीराम ने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए धनुष उठाया। जैसे ही उन्होंने प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए धनुष को खींचा, वह टूट गया। धनुष टूटने की गूंज से स्वयंवर स्थल पर उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए। इस प्रसंग का मंचन देखकर दर्शकों ने जयकारों के साथ भगवान श्रीराम का अभिनंदन किया।

भगवान परशुराम और लक्ष्मण के संवाद ने बढ़ाया रोमांच

शिव धनुष टूटने की घटना के बाद भगवान परशुराम को इसकी जानकारी हुई। वे जनक जी के दरबार में पहुंचे और धनुष भंग करने वाले के बारे में पूछने लगे।

इसके बाद भगवान परशुराम और लक्ष्मण के बीच तीखा संवाद हुआ। भगवान परशुराम ने अपने फरसे का उल्लेख करते हुए लक्ष्मण को शांत रहने की चेतावनी दी। उन्होंने अपने पराक्रम और 21 बार पृथ्वी को क्षत्रियों से विहीन करने की बात कही।

लक्ष्मण ने भी अपने तर्कों और निर्भीक वाणी से उत्तर दिया। इस संवाद ने रामलीला के मंच पर रोमांच पैदा कर दिया। दर्शकों ने दोनों पात्रों के संवाद और अभिनय को खूब सराहा।

हालांकि, भगवान श्रीराम ने शांतिपूर्ण और विनम्र वाणी से स्थिति को संभाला। भगवान श्रीराम के स्वरूप और उनके तेज को पहचानने के बाद भगवान परशुराम को यह विश्वास हो गया कि श्रीहरि विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार लिया है।

इसके बाद भगवान परशुराम ने भगवान श्रीराम को अपना सारंग धनुष दिया। श्रीराम द्वारा उस पर प्रत्यंचा चढ़ाने के बाद परशुराम जी ने उन्हें आशीर्वाद दिया और वहां से प्रस्थान किया।

इस पूरे प्रसंग ने दर्शकों को भगवान श्रीराम की विनम्रता, लक्ष्मण की निर्भीकता और भगवान परशुराम के तेज का परिचय कराया।

जनकपुर में विवाह उत्सव, माता सीता की विदाई ने किया भावुक

अयोध्या से पहुंची बारात, चारों भाइयों के विवाह का मंचन

शिव धनुष भंग और स्वयंवर की घटना के बाद जनकपुर से अयोध्या के महाराज दशरथ को विवाह का समाचार भेजा गया। इसके बाद महाराज दशरथ बारात लेकर जनकपुर पहुंचे।

जनकपुर में अयोध्या से आई बारात का दिव्य स्वागत किया गया। विवाह का उत्सव पूरे उल्लास के साथ मनाया गया। मंचन में महाराज जनक और महाराज दशरथ के परिवारों के बीच विवाह संबंधों की खुशी को दर्शाया गया। भगवान श्रीराम और माता सीता के साथ चारों भाइयों के विवाह का प्रसंग भी प्रस्तुत किया गया।

विवाह के दौरान रामलीला परिसर में उत्सव जैसा वातावरण बन गया। दर्शकों ने विवाह प्रसंग को श्रद्धा और आनंद के साथ देखा। भगवान श्रीराम और माता सीता के जयकारों से परिसर गूंजता रहा।

इसके बाद माता सीता की विदाई का प्रसंग आया। यह दृश्य रामलीला के सबसे भावुक क्षणों में शामिल रहा। पिता के घर से बेटी की विदाई के समय होने वाले भावनात्मक दर्द को कलाकारों ने प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।

जनकपुर के लोगों का विरह और माता सीता की विदाई देखकर दर्शक भावुक हो गए। इस प्रसंग ने परिवार, रिश्तों और बेटी के प्रति माता-पिता के स्नेह को दर्शाया।

अयोध्या में चारों पुत्रों और वधुओं का स्वागत

माता सीता और भगवान श्रीराम सहित चारों भाइयों के विवाह के बाद अयोध्या में उत्सव का वातावरण दिखाया गया। राजमहल को सजाया गया और तीनों माताओं ने नववधुओं के स्वागत की तैयारियां कीं।

अयोध्या में भगवान श्रीराम, माता सीता और परिवार के आगमन का प्रसंग हर्षोल्लास के साथ प्रस्तुत किया गया। पूरे राजमहल में खुशियां छा गईं। दर्शकों ने इस दृश्य को आनंदपूर्वक देखा।

रामलीला के इस हिस्से ने विवाह के बाद परिवार में आने वाली खुशियों और पारिवारिक परंपराओं की सुंदर झलक दिखाई।

कैकई-मंथरा संवाद के बाद श्रीराम वनवास का मार्मिक प्रसंग

राजतिलक की तैयारियों के बीच बदली अयोध्या की परिस्थितियां

विवाह के बाद अयोध्या में भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारियां शुरू हुईं। महाराज दशरथ भगवान श्रीराम को राज्य सौंपकर राजकाज से मुक्त होना चाहते थे। राजतिलक की तैयारियों से अयोध्या में खुशी का माहौल था।

लेकिन घटनाक्रम ने अचानक नया मोड़ लिया। रामलीला में कैकई और मंथरा के संवाद का मंचन किया गया। मंथरा के समझाने के बाद कैकई ने महाराज दशरथ से अपने दो वरदान मांगे। इनमें भरत के लिए राज्य और भगवान श्रीराम के लिए 14 वर्ष का वनवास शामिल था।

इस घटना ने अयोध्या की खुशियों को दुख में बदल दिया। जिस राजतिलक की तैयारियों को लेकर पूरा नगर उत्साहित था, उसी के स्थान पर भगवान श्रीराम के वनवास की स्थिति बन गई।

श्रीराम के वनवास पर दर्शकों की आंखें हुईं नम

भगवान श्रीराम के वनवास के प्रसंग का मंचन अत्यंत भावुक रहा। भगवान श्रीराम ने पिता के वचन और मर्यादा का सम्मान करते हुए वन जाने का निर्णय स्वीकार किया।

इस दृश्य में त्याग, कर्तव्य और पारिवारिक मर्यादा का संदेश दिखाई दिया। भगवान श्रीराम के वनवास के समय रामलीला देखने पहुंचे अनेक दर्शक भावुक हो गए। पूरे परिसर में कुछ समय के लिए गंभीर वातावरण बन गया।

सीता स्वयंवर और विवाह के दौरान जहां दर्शक आनंदित दिखाई दिए, वहीं वनवास के प्रसंग ने उनकी आंखें नम कर दीं। कलाकारों ने अलग-अलग भावों के माध्यम से रामायण के इन महत्वपूर्ण प्रसंगों को जीवंत किया।

आयोजकों के अनुसार, इन लीलाओं ने दर्शकों का मन मोह लिया। भगवान श्रीराम और माता सीता के जयकारों से पूरा श्री धार्मिक रामलीला परिसर गूंज उठा।

गोस्वामी सुशील जी महाराज के दिशा-निर्देशन में हो रहा मंचन

श्री धार्मिक रामलीला का आयोजन परम श्रद्धेय गोस्वामी सुशील जी महाराज के दिशा-निर्देशन और अध्यक्ष श्री आनंद भाटी के मार्गदर्शन में किया जा रहा है।

आयोजन के माध्यम से रामायण के प्रमुख प्रसंगों को मंच पर प्रस्तुत किया जा रहा है। इन प्रसंगों में भगवान श्रीराम के आदर्श, गुरु के प्रति सम्मान, पारिवारिक संबंधों की गरिमा, वचन पालन और त्याग जैसे मूल्यों को प्रमुखता दी जा रही है।

रामलीला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी है। मंचन के दौरान दर्शकों को रामायण की घटनाओं और पात्रों के माध्यम से जीवन के आदर्शों को समझने का अवसर मिल रहा है।

17 से 19 अक्टूबर तक होंगे रामायण के प्रमुख प्रसंग

श्री धार्मिक रामलीला कमेटी की ओर से आगामी दिनों के मंचन के कार्यक्रम भी बताए गए हैं। आयोजकों के अनुसार, 17 से 19 अक्टूबर तक रामायण के कई महत्वपूर्ण प्रसंग प्रस्तुत किए जाएंगे।

17 अक्टूबर 2026: राम-भरत मिलाप, शबरी प्रसंग, राम-हनुमान मिलन, किष्किंधा प्रसंग, बाली वध और अशोक वाटिका से जुड़े दृश्य प्रस्तुत किए जाने हैं।

18 अक्टूबर 2026: लंका दहन, सेतु निर्माण और रावण-अंगद संवाद का मंचन प्रस्तावित है।

19 अक्टूबर 2026: लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध तथा भगवान श्रीराम और कुंभकरण के बीच युद्ध सहित रावण युद्ध से जुड़े प्रमुख प्रसंग प्रस्तुत किए जाने हैं।

इन कार्यक्रमों के माध्यम से दर्शकों को रामायण की कथा के आगे के महत्वपूर्ण पड़ाव देखने को मिलेंगे। आयोजकों को उम्मीद है कि आगामी मंचन भी क्षेत्रवासियों के लिए आकर्षण का केंद्र बनेगा।

रामलीला कमेटी के पदाधिकारी और सदस्य रहे उपस्थित

इस अवसर पर संस्था के संस्थापक गोस्वामी सुशील जी महाराज, संस्थापक श्री राजकुमार नागर, श्री प्रदीप शर्मा, श्री शेर सिंह भाटी, मुख्य संरक्षक श्री नरेश गुप्ता, संरक्षक श्री सुशील नागर, श्री धीरेंद्र भाटी, श्री धीरज शर्मा, श्री बालकिशन सफीपुर, श्री दिनेश गुप्ता, श्री पवन नागर, श्री मनोज गुप्ता और श्री सतीश भाटी उपस्थित रहे।

इसके अलावा अध्यक्ष श्री आनंद भाटी, महासचिव श्रीमती ममता तिवारी, कोषाध्यक्ष श्री अजय नागर, वरिष्ठ उपाध्यक्ष श्री महेश शर्मा बदौली, श्री उमेश गौतम, श्री सत्यवीर मुखिया, श्रीमती रोशनी सिंह, श्री महेश कमांडो, श्री चैन पाल प्रधान, श्री जितेंद्र भाटी, श्री सुभाष भाटी, श्री मनीष डाबर, मीडिया प्रभारी श्री अतुल आनंद, उपाध्यक्ष श्री फिरे प्रधान, श्री पीपी शर्मा, श्री श्याम सुंदर फौजी, श्री यशपाल नागर, सचिव श्रीमती ज्योति सिंह, श्रीमती गीता शागर, श्री राकेश भाटी, श्री भगवत भाटी, श्री तेज कुमार भाटी, श्री सुंदर भाटी, श्री पवन भाटी, श्री वीरपाल मावी और श्री जय शर्मा सहित अन्य सदस्य मौजूद रहे।

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ग्रेटर नोएडा में रामलीला: सीता स्वयंवर से श्रीराम वनवास तक, भावुक हुए दर्शक

शिव धनुष भंग के बाद श्रीराम और माता सीता का विवाह, जनकपुर से अयोध्या तक गूंजे जयकारे

कैकई-मंथरा संवाद के बाद श्रीराम के वनवास का मंचन, श्रद्धालुओं की आंखें हुईं नम

ग्रेटर नोएडा। ग्रेटर नोएडा रामलीला में 16 अक्टूबर 2026 को श्री धार्मिक रामलीला कमेटी द्वारा आयोजित भव्य रामलीला एवं दशहरा महोत्सव में सीता स्वयंवर, भगवान श्रीराम और माता सीता के विवाह, माता सीता की विदाई तथा श्रीराम वनवास की लीलाओं का भावपूर्ण मंचन किया गया। इन प्रसंगों ने दर्शकों को कभी हर्ष और उल्लास से भर दिया, तो कभी भावुक कर दिया। भगवान श्रीराम और माता सीता के जयकारों से पूरा रामलीला परिसर गूंज उठा।

परम श्रद्धेय गोस्वामी सुशील जी महाराज के दिशा-निर्देशन और युवा अध्यक्ष श्री आनंद भाटी के मार्गदर्शन में श्री धार्मिक रामलीला का मंचन किया जा रहा है। आयोजकों के अनुसार, रामलीला एवं दशहरा महोत्सव 11 अक्टूबर से 20 अक्टूबर 2026 तक प्रतिदिन शाम 7 बजे आयोजित किया जा रहा है। इस आयोजन का उद्देश्य धार्मिक परंपराओं को जीवंत बनाए रखने के साथ-साथ नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति, मर्यादा, पारिवारिक मूल्यों और आदर्श जीवन की शिक्षा देना भी है।

सीता स्वयंवर में शिव धनुष भंग का अद्भुत मंचन

भगवान श्रीराम और माता सीता के विवाह प्रसंग ने मोहा मन

संस्था के अध्यक्ष श्री आनंद भाटी ने बताया कि रामलीला के छठे दिन की लीला में माता सीता के स्वयंवर का मंचन किया गया। महाराज जनक ने स्वयंवर में शर्त रखी थी कि जो भी शिव धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा, उसी के साथ उनकी पुत्री सीता का विवाह होगा।

इस स्वयंवर में अनेक राजा-महाराजा और पराक्रमी योद्धा शामिल हुए। सभी ने शिव धनुष उठाने और उस पर प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास किया, लेकिन कोई भी धनुष को हिला तक नहीं सका। एक के बाद एक योद्धाओं के असफल होने से महाराज जनक निराश हो गए।

महाराज जनक की निराशा देखकर भगवान लक्ष्मण को बहुत दुख हुआ। उन्होंने अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए कहा कि रघुवंशी अभी जीवित हैं। इसी बीच महर्षि विश्वामित्र ने भगवान श्रीराम को शिव धनुष उठाने की आज्ञा दी।

भगवान श्रीराम ने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए धनुष उठाया। जैसे ही उन्होंने प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए धनुष को खींचा, वह टूट गया। धनुष टूटने की गूंज से स्वयंवर स्थल पर उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए। इस प्रसंग का मंचन देखकर दर्शकों ने जयकारों के साथ भगवान श्रीराम का अभिनंदन किया।

भगवान परशुराम और लक्ष्मण के संवाद ने बढ़ाया रोमांच

शिव धनुष टूटने की घटना के बाद भगवान परशुराम को इसकी जानकारी हुई। वे जनक जी के दरबार में पहुंचे और धनुष भंग करने वाले के बारे में पूछने लगे।

इसके बाद भगवान परशुराम और लक्ष्मण के बीच तीखा संवाद हुआ। भगवान परशुराम ने अपने फरसे का उल्लेख करते हुए लक्ष्मण को शांत रहने की चेतावनी दी। उन्होंने अपने पराक्रम और 21 बार पृथ्वी को क्षत्रियों से विहीन करने की बात कही।

लक्ष्मण ने भी अपने तर्कों और निर्भीक वाणी से उत्तर दिया। इस संवाद ने रामलीला के मंच पर रोमांच पैदा कर दिया। दर्शकों ने दोनों पात्रों के संवाद और अभिनय को खूब सराहा।

हालांकि, भगवान श्रीराम ने शांतिपूर्ण और विनम्र वाणी से स्थिति को संभाला। भगवान श्रीराम के स्वरूप और उनके तेज को पहचानने के बाद भगवान परशुराम को यह विश्वास हो गया कि श्रीहरि विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार लिया है।

इसके बाद भगवान परशुराम ने भगवान श्रीराम को अपना सारंग धनुष दिया। श्रीराम द्वारा उस पर प्रत्यंचा चढ़ाने के बाद परशुराम जी ने उन्हें आशीर्वाद दिया और वहां से प्रस्थान किया।

इस पूरे प्रसंग ने दर्शकों को भगवान श्रीराम की विनम्रता, लक्ष्मण की निर्भीकता और भगवान परशुराम के तेज का परिचय कराया।

जनकपुर में विवाह उत्सव, माता सीता की विदाई ने किया भावुक

अयोध्या से पहुंची बारात, चारों भाइयों के विवाह का मंचन

शिव धनुष भंग और स्वयंवर की घटना के बाद जनकपुर से अयोध्या के महाराज दशरथ को विवाह का समाचार भेजा गया। इसके बाद महाराज दशरथ बारात लेकर जनकपुर पहुंचे।

जनकपुर में अयोध्या से आई बारात का दिव्य स्वागत किया गया। विवाह का उत्सव पूरे उल्लास के साथ मनाया गया। मंचन में महाराज जनक और महाराज दशरथ के परिवारों के बीच विवाह संबंधों की खुशी को दर्शाया गया। भगवान श्रीराम और माता सीता के साथ चारों भाइयों के विवाह का प्रसंग भी प्रस्तुत किया गया।

विवाह के दौरान रामलीला परिसर में उत्सव जैसा वातावरण बन गया। दर्शकों ने विवाह प्रसंग को श्रद्धा और आनंद के साथ देखा। भगवान श्रीराम और माता सीता के जयकारों से परिसर गूंजता रहा।

इसके बाद माता सीता की विदाई का प्रसंग आया। यह दृश्य रामलीला के सबसे भावुक क्षणों में शामिल रहा। पिता के घर से बेटी की विदाई के समय होने वाले भावनात्मक दर्द को कलाकारों ने प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।

जनकपुर के लोगों का विरह और माता सीता की विदाई देखकर दर्शक भावुक हो गए। इस प्रसंग ने परिवार, रिश्तों और बेटी के प्रति माता-पिता के स्नेह को दर्शाया।

अयोध्या में चारों पुत्रों और वधुओं का स्वागत

माता सीता और भगवान श्रीराम सहित चारों भाइयों के विवाह के बाद अयोध्या में उत्सव का वातावरण दिखाया गया। राजमहल को सजाया गया और तीनों माताओं ने नववधुओं के स्वागत की तैयारियां कीं।

अयोध्या में भगवान श्रीराम, माता सीता और परिवार के आगमन का प्रसंग हर्षोल्लास के साथ प्रस्तुत किया गया। पूरे राजमहल में खुशियां छा गईं। दर्शकों ने इस दृश्य को आनंदपूर्वक देखा।

रामलीला के इस हिस्से ने विवाह के बाद परिवार में आने वाली खुशियों और पारिवारिक परंपराओं की सुंदर झलक दिखाई।

कैकई-मंथरा संवाद के बाद श्रीराम वनवास का मार्मिक प्रसंग

राजतिलक की तैयारियों के बीच बदली अयोध्या की परिस्थितियां

विवाह के बाद अयोध्या में भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारियां शुरू हुईं। महाराज दशरथ भगवान श्रीराम को राज्य सौंपकर राजकाज से मुक्त होना चाहते थे। राजतिलक की तैयारियों से अयोध्या में खुशी का माहौल था।

लेकिन घटनाक्रम ने अचानक नया मोड़ लिया। रामलीला में कैकई और मंथरा के संवाद का मंचन किया गया। मंथरा के समझाने के बाद कैकई ने महाराज दशरथ से अपने दो वरदान मांगे। इनमें भरत के लिए राज्य और भगवान श्रीराम के लिए 14 वर्ष का वनवास शामिल था।

इस घटना ने अयोध्या की खुशियों को दुख में बदल दिया। जिस राजतिलक की तैयारियों को लेकर पूरा नगर उत्साहित था, उसी के स्थान पर भगवान श्रीराम के वनवास की स्थिति बन गई।

श्रीराम के वनवास पर दर्शकों की आंखें हुईं नम

भगवान श्रीराम के वनवास के प्रसंग का मंचन अत्यंत भावुक रहा। भगवान श्रीराम ने पिता के वचन और मर्यादा का सम्मान करते हुए वन जाने का निर्णय स्वीकार किया।

इस दृश्य में त्याग, कर्तव्य और पारिवारिक मर्यादा का संदेश दिखाई दिया। भगवान श्रीराम के वनवास के समय रामलीला देखने पहुंचे अनेक दर्शक भावुक हो गए। पूरे परिसर में कुछ समय के लिए गंभीर वातावरण बन गया।

सीता स्वयंवर और विवाह के दौरान जहां दर्शक आनंदित दिखाई दिए, वहीं वनवास के प्रसंग ने उनकी आंखें नम कर दीं। कलाकारों ने अलग-अलग भावों के माध्यम से रामायण के इन महत्वपूर्ण प्रसंगों को जीवंत किया।

आयोजकों के अनुसार, इन लीलाओं ने दर्शकों का मन मोह लिया। भगवान श्रीराम और माता सीता के जयकारों से पूरा श्री धार्मिक रामलीला परिसर गूंज उठा।

गोस्वामी सुशील जी महाराज के दिशा-निर्देशन में हो रहा मंचन

श्री धार्मिक रामलीला का आयोजन परम श्रद्धेय गोस्वामी सुशील जी महाराज के दिशा-निर्देशन और अध्यक्ष श्री आनंद भाटी के मार्गदर्शन में किया जा रहा है।

आयोजन के माध्यम से रामायण के प्रमुख प्रसंगों को मंच पर प्रस्तुत किया जा रहा है। इन प्रसंगों में भगवान श्रीराम के आदर्श, गुरु के प्रति सम्मान, पारिवारिक संबंधों की गरिमा, वचन पालन और त्याग जैसे मूल्यों को प्रमुखता दी जा रही है।

रामलीला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी है। मंचन के दौरान दर्शकों को रामायण की घटनाओं और पात्रों के माध्यम से जीवन के आदर्शों को समझने का अवसर मिल रहा है।

17 से 19 अक्टूबर तक होंगे रामायण के प्रमुख प्रसंग

श्री धार्मिक रामलीला कमेटी की ओर से आगामी दिनों के मंचन के कार्यक्रम भी बताए गए हैं। आयोजकों के अनुसार, 17 से 19 अक्टूबर तक रामायण के कई महत्वपूर्ण प्रसंग प्रस्तुत किए जाएंगे।

17 अक्टूबर 2026: राम-भरत मिलाप, शबरी प्रसंग, राम-हनुमान मिलन, किष्किंधा प्रसंग, बाली वध और अशोक वाटिका से जुड़े दृश्य प्रस्तुत किए जाने हैं।

18 अक्टूबर 2026: लंका दहन, सेतु निर्माण और रावण-अंगद संवाद का मंचन प्रस्तावित है।

19 अक्टूबर 2026: लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध तथा भगवान श्रीराम और कुंभकरण के बीच युद्ध सहित रावण युद्ध से जुड़े प्रमुख प्रसंग प्रस्तुत किए जाने हैं।

इन कार्यक्रमों के माध्यम से दर्शकों को रामायण की कथा के आगे के महत्वपूर्ण पड़ाव देखने को मिलेंगे। आयोजकों को उम्मीद है कि आगामी मंचन भी क्षेत्रवासियों के लिए आकर्षण का केंद्र बनेगा।

रामलीला कमेटी के पदाधिकारी और सदस्य रहे उपस्थित

इस अवसर पर संस्था के संस्थापक गोस्वामी सुशील जी महाराज, संस्थापक श्री राजकुमार नागर, श्री प्रदीप शर्मा, श्री शेर सिंह भाटी, मुख्य संरक्षक श्री नरेश गुप्ता, संरक्षक श्री सुशील नागर, श्री धीरेंद्र भाटी, श्री धीरज शर्मा, श्री बालकिशन सफीपुर, श्री दिनेश गुप्ता, श्री पवन नागर, श्री मनोज गुप्ता और श्री सतीश भाटी उपस्थित रहे।

इसके अलावा अध्यक्ष श्री आनंद भाटी, महासचिव श्रीमती ममता तिवारी, कोषाध्यक्ष श्री अजय नागर, वरिष्ठ उपाध्यक्ष श्री महेश शर्मा बदौली, श्री उमेश गौतम, श्री सत्यवीर मुखिया, श्रीमती रोशनी सिंह, श्री महेश कमांडो, श्री चैन पाल प्रधान, श्री जितेंद्र भाटी, श्री सुभाष भाटी, श्री मनीष डाबर, मीडिया प्रभारी श्री अतुल आनंद, उपाध्यक्ष श्री फिरे प्रधान, श्री पीपी शर्मा, श्री श्याम सुंदर फौजी, श्री यशपाल नागर, सचिव श्रीमती ज्योति सिंह, श्रीमती गीता शागर, श्री राकेश भाटी, श्री भगवत भाटी, श्री तेज कुमार भाटी, श्री सुंदर भाटी, श्री पवन भाटी, श्री वीरपाल मावी और श्री जय शर्मा सहित अन्य सदस्य मौजूद रहे।

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