Friday, October 16, 2026
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ग्रेटर नोएडा रामलीला: श्रीराम के राजतिलक की घोषणा से चिंतित हुए देवता, कैकयी ने मांगे दो वरदान

राजा दशरथ ने श्रीराम के राज्याभिषेक की घोषणा की, मंथरा-कैकयी संवाद के बाद बदली अयोध्या की परिस्थितियां

श्रीराम वनवास, केवट प्रसंग और भरत के वन में पहुंचने की लीला का भावपूर्ण मंचन, 21 वर्षों से आयोजन कर रही है कमेटी

ग्रेटर नोएडा। ग्रेटर नोएडा रामलीला में श्री रामलीला कमेटी ग्रेटर नोएडा की ओर से साइट-4 में आयोजित विजय महोत्सव के दौरान 16 अक्टूबर को भगवान श्रीराम के राजतिलक की घोषणा, कैकयी-मंथरा संवाद, श्रीराम वनवास, केवट प्रसंग और भरत के श्रीराम को मनाने वन में जाने की लीलाओं का मंचन किया गया। इन प्रसंगों के माध्यम से कलाकारों ने रामायण की महत्वपूर्ण घटनाओं को जीवंत किया। राजा दशरथ की व्याकुलता, भगवान श्रीराम का वनगमन और भरत का भाई के प्रति प्रेम मंचन के प्रमुख आकर्षण रहे।
श्री रामलीला कमेटी के अनुसार, कार्यक्रम की शुरुआत गणेश वंदना से हुई। कमेटी पिछले 21 वर्षों से विजय महोत्सव के अंतर्गत रामलीला मंचन का आयोजन कर रही है। आयोजकों का कहना है कि हर वर्ष मंचन में कुछ नया प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाता है, ताकि दर्शकों को रामायण के प्रसंगों को देखने और उनसे प्रेरणा लेने का अवसर मिले।
श्रीराम के राजतिलक की घोषणा से देवलोक में बढ़ी चिंता
मंथरा की मति फेरने के लिए देवी सरस्वती से जुड़ा प्रसंग
कमेटी के कोषाध्यक्ष मनोज गर्ग ने बताया कि मंचन में राजा दशरथ भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक की घोषणा करते हैं। इस घोषणा के बाद अयोध्या में उत्साह का वातावरण बनता है। हालांकि, रामायण के प्रसंग के अनुसार, देवलोक में देवता चिंतित हो जाते हैं।
देवताओं के बीच विचार-विमर्श होता है। इसके बाद देवी सरस्वती से मंथरा की बुद्धि को प्रभावित करने का अनुरोध करने का प्रसंग प्रस्तुत किया गया। मंथरा के विचारों से कैकयी प्रभावित होती हैं और राजा दशरथ से अपने दो वरदान मांगने का निर्णय लेती हैं।
यह प्रसंग रामायण की कथा में महत्वपूर्ण मोड़ लेकर आता है। जिस अयोध्या में भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारियां चल रही थीं, वहां अचानक परिस्थितियां बदलने लगती हैं।


कैकयी ने मांगे दो वरदान, राजा दशरथ को लगा गहरा आघात

मंचन के अनुसार, कैकयी राजा दशरथ से दो वरदान मांगती हैं। पहले वरदान में वह भरत के लिए राजगद्दी और दूसरे में भगवान श्रीराम के लिए 14 वर्ष का वनवास मांगती हैं।
कैकयी की मांग सुनकर राजा दशरथ गहरे दुख में डूब जाते हैं। उनके सामने एक ओर अपने पुत्र श्रीराम के प्रति स्नेह होता है, तो दूसरी ओर पूर्व में दिए गए वचन को निभाने की मर्यादा।
इस प्रसंग में राजा दशरथ की विवशता और मानसिक पीड़ा को प्रमुखता से दिखाया गया। भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक की खुशी देखते ही देखते शोक में बदल जाती है।
राजा दशरथ को श्रवण कुमार के पिता शांतनु के श्राप की याद आती है। रामायण के इस प्रसंग में श्रवण कुमार की मृत्यु के बाद उनके माता-पिता द्वारा दिए गए श्राप का उल्लेख किया जाता है। श्राप के अनुसार, राजा दशरथ को भी पुत्र वियोग का दुख सहना पड़ता है।
भगवान श्रीराम के वनवास की घटना राजा दशरथ को भीतर तक तोड़ देती है। मंचन में उनके पुत्र वियोग और दुखद अंत को भावपूर्ण तरीके से प्रस्तुत किया गया।
श्रीराम वनवास और केवट प्रसंग ने दर्शकों को किया भावुक
गंगा किनारे केवट ने चरण धोकर भगवान श्रीराम को कराया पार
श्री रामलीला कमेटी के महासचिव बिजेंद्र सिंह आर्य ने बताया कि वनवास के दौरान भगवान श्रीराम गंगा नदी के किनारे पहुंचते हैं। यहां केवट का प्रसंग प्रस्तुत किया गया।
रामायण की लोकप्रिय कथा के अनुसार, केवट भगवान श्रीराम के चरण धोने की इच्छा व्यक्त करता है। इसके बाद वह उन्हें गंगा नदी पार कराता है। यह प्रसंग भगवान श्रीराम और उनके भक्त के बीच श्रद्धा, प्रेम और समर्पण को दर्शाता है।
मंचन के दौरान केवट की भक्ति और भगवान श्रीराम के सहज व्यवहार को प्रस्तुत किया गया। इस प्रसंग के माध्यम से यह संदेश सामने आया कि भक्ति में पद, प्रतिष्ठा और सामाजिक भेदभाव से अधिक महत्व प्रेम और समर्पण का होता है।
गंगा पार करने के बाद भगवान श्रीराम भारद्वाज ऋषि का आशीर्वाद लेते हैं और आगे वन की ओर प्रस्थान करते हैं। वनगमन के इन दृश्यों ने रामलीला की कथा को आगे बढ़ाया।

भरत को श्रीराम के वनवास की जानकारी मिली, मनाने वन पहुंचे

उधर, भरत के अयोध्या लौटने का प्रसंग मंचित किया गया। अयोध्या पहुंचने पर जब उन्हें भगवान श्रीराम के वनवास की जानकारी मिलती है, तो वे दुखी और नाराज हो जाते हैं।
मंचन में भरत का माता कैकयी के प्रति आक्रोश दिखाया गया। वे इस निर्णय को लेकर अपनी नाराजगी व्यक्त करते हैं और भगवान श्रीराम को वापस अयोध्या लाने के उद्देश्य से वन की ओर जाते हैं।
भरत का यह प्रसंग भाईचारे, त्याग और पारिवारिक प्रेम का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है। भरत के लिए राजगद्दी से अधिक महत्व भगवान श्रीराम के प्रति सम्मान और उनके साथ संबंध का है।
रामायण की कथा में भरत का चरित्र सत्ता के प्रति मोह के बजाय कर्तव्य और प्रेम को महत्व देने का संदेश देता है। इसी कारण यह प्रसंग दर्शकों के लिए भावनात्मक और प्रेरणादायक बना रहा।

21 वर्षों से रामलीला का आयोजन कर रही है कमेटी

हर वर्ष मंचन में कुछ नया दिखाने का प्रयास
श्री रामलीला कमेटी के मीडिया प्रभारी विनोद कसाना ने बताया कि कमेटी पिछले 21 वर्षों से विजय महोत्सव के अंतर्गत रामलीला मंचन कार्यक्रम आयोजित कर रही है।
उन्होंने बताया कि कमेटी प्रत्येक वर्ष मंचन में कुछ नया प्रस्तुत करने का प्रयास करती है। इस बार भी दर्शकों के लिए विशेष तैयारियां की गई हैं।
आयोजकों के अनुसार, रामलीला का उद्देश्य धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत रखना तथा लोगों को रामायण के आदर्शों से जोड़ना है। भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़े प्रसंगों के माध्यम से मर्यादा, त्याग, कर्तव्य, भाईचारे और पारिवारिक मूल्यों का संदेश दिया जाता है।
कमेटी का कहना है कि रामलीला देखने आने वाले लोगों को धार्मिक मंचन के साथ मनोरंजन और मेले का अनुभव भी मिल रहा है।

रामलीला परिसर में मेले के आकर्षण, बच्चों के लिए मनोरंजन की व्यवस्था

मीडिया प्रभारी विनोद कसाना के अनुसार, इस बार रामलीला परिसर में नगरवासियों के लिए मेला भी लगाया गया है। मेले में खाने-पीने के स्टॉल और घरेलू उपयोग के सामान की दुकानें लगाई गई हैं।
इसके अलावा बच्चों के मनोरंजन के लिए झूले, सर्कस, जादू और अन्य मनोरंजन के साधन उपलब्ध कराए गए हैं। इस व्यवस्था के माध्यम से परिवारों को रामलीला के साथ मेले का आनंद लेने का अवसर मिल रहा है।
आयोजकों ने बताया कि मेले में आने वाले लोगों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए विभिन्न व्यवस्थाएं की गई हैं। उनका कहना है कि इस बार सुरक्षा के लिए पुलिस और प्रशासन की अच्छी व्यवस्था की गई है।
हालांकि, सुरक्षा व्यवस्था के संबंध में किसी स्वतंत्र आधिकारिक विवरण का उल्लेख प्रेस विज्ञप्ति में नहीं किया गया है। इसलिए इसे आयोजकों की ओर से दी गई जानकारी के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

आगामी लीला में नारद-सूपर्णखा संवाद और सीता हरण का मंचन

संयुक्त महासचिव सौरभ बंसल ने आगामी कार्यक्रम की जानकारी देते हुए बताया कि आगे की रामलीला में नारद-सूपर्णखा संवाद, सीता हरण, राम वियोग और जटायु मरण जैसी लीलाओं का मंचन किया जाएगा।
इन प्रसंगों में रामायण की कथा एक नए मोड़ पर पहुंचेगी। सीता हरण के बाद भगवान श्रीराम की खोज यात्रा, जटायु का संघर्ष और भगवान श्रीराम का विरह आगे की कथा के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।

कमेटी के पदाधिकारी और सदस्य रहे उपस्थित

रामलीला मंचन के अवसर पर कमेटी के अध्यक्ष मनजीत सिंह, महासचिव बिजेंद्र सिंह आर्य, कोषाध्यक्ष मनोज गर्ग, संयुक्त महासचिव सौरभ बंसल और मीडिया प्रभारी विनोद कसाना सहित कई पदाधिकारी एवं सदस्य उपस्थित रहे।
इनके अलावा धर्मपाल भाटी, कुलदीप शर्मा, मुकेश शर्मा, केके शर्मा, हरेन्द्र भाटी, मुकुल गोयल, सुभाष चंदेल, अमित गोयल, अतुल जिंदल, गिरीश जिंदल, श्यामवीर भाटी, मनोज यादव, सुभाष, अनिल कसाना, सुनील प्रधान, अनुज उपाध्याय, अतुल जैन, अरुण गुप्ता, अंकुर गर्ग, विशाल जैन, दीपक भाटी, राहुल नंबरदार, प्रभाकर देशमुख, विकास आर्य, रिंकू आर्य और प्रमोद मास्टर सहित अन्य सदस्य मौजूद रहे।

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ग्रेटर नोएडा रामलीला: श्रीराम के राजतिलक की घोषणा से चिंतित हुए देवता, कैकयी ने मांगे दो वरदान

राजा दशरथ ने श्रीराम के राज्याभिषेक की घोषणा की, मंथरा-कैकयी संवाद के बाद बदली अयोध्या की परिस्थितियां

श्रीराम वनवास, केवट प्रसंग और भरत के वन में पहुंचने की लीला का भावपूर्ण मंचन, 21 वर्षों से आयोजन कर रही है कमेटी

ग्रेटर नोएडा। ग्रेटर नोएडा रामलीला में श्री रामलीला कमेटी ग्रेटर नोएडा की ओर से साइट-4 में आयोजित विजय महोत्सव के दौरान 16 अक्टूबर को भगवान श्रीराम के राजतिलक की घोषणा, कैकयी-मंथरा संवाद, श्रीराम वनवास, केवट प्रसंग और भरत के श्रीराम को मनाने वन में जाने की लीलाओं का मंचन किया गया। इन प्रसंगों के माध्यम से कलाकारों ने रामायण की महत्वपूर्ण घटनाओं को जीवंत किया। राजा दशरथ की व्याकुलता, भगवान श्रीराम का वनगमन और भरत का भाई के प्रति प्रेम मंचन के प्रमुख आकर्षण रहे।
श्री रामलीला कमेटी के अनुसार, कार्यक्रम की शुरुआत गणेश वंदना से हुई। कमेटी पिछले 21 वर्षों से विजय महोत्सव के अंतर्गत रामलीला मंचन का आयोजन कर रही है। आयोजकों का कहना है कि हर वर्ष मंचन में कुछ नया प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाता है, ताकि दर्शकों को रामायण के प्रसंगों को देखने और उनसे प्रेरणा लेने का अवसर मिले।
श्रीराम के राजतिलक की घोषणा से देवलोक में बढ़ी चिंता
मंथरा की मति फेरने के लिए देवी सरस्वती से जुड़ा प्रसंग
कमेटी के कोषाध्यक्ष मनोज गर्ग ने बताया कि मंचन में राजा दशरथ भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक की घोषणा करते हैं। इस घोषणा के बाद अयोध्या में उत्साह का वातावरण बनता है। हालांकि, रामायण के प्रसंग के अनुसार, देवलोक में देवता चिंतित हो जाते हैं।
देवताओं के बीच विचार-विमर्श होता है। इसके बाद देवी सरस्वती से मंथरा की बुद्धि को प्रभावित करने का अनुरोध करने का प्रसंग प्रस्तुत किया गया। मंथरा के विचारों से कैकयी प्रभावित होती हैं और राजा दशरथ से अपने दो वरदान मांगने का निर्णय लेती हैं।
यह प्रसंग रामायण की कथा में महत्वपूर्ण मोड़ लेकर आता है। जिस अयोध्या में भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारियां चल रही थीं, वहां अचानक परिस्थितियां बदलने लगती हैं।


कैकयी ने मांगे दो वरदान, राजा दशरथ को लगा गहरा आघात

मंचन के अनुसार, कैकयी राजा दशरथ से दो वरदान मांगती हैं। पहले वरदान में वह भरत के लिए राजगद्दी और दूसरे में भगवान श्रीराम के लिए 14 वर्ष का वनवास मांगती हैं।
कैकयी की मांग सुनकर राजा दशरथ गहरे दुख में डूब जाते हैं। उनके सामने एक ओर अपने पुत्र श्रीराम के प्रति स्नेह होता है, तो दूसरी ओर पूर्व में दिए गए वचन को निभाने की मर्यादा।
इस प्रसंग में राजा दशरथ की विवशता और मानसिक पीड़ा को प्रमुखता से दिखाया गया। भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक की खुशी देखते ही देखते शोक में बदल जाती है।
राजा दशरथ को श्रवण कुमार के पिता शांतनु के श्राप की याद आती है। रामायण के इस प्रसंग में श्रवण कुमार की मृत्यु के बाद उनके माता-पिता द्वारा दिए गए श्राप का उल्लेख किया जाता है। श्राप के अनुसार, राजा दशरथ को भी पुत्र वियोग का दुख सहना पड़ता है।
भगवान श्रीराम के वनवास की घटना राजा दशरथ को भीतर तक तोड़ देती है। मंचन में उनके पुत्र वियोग और दुखद अंत को भावपूर्ण तरीके से प्रस्तुत किया गया।
श्रीराम वनवास और केवट प्रसंग ने दर्शकों को किया भावुक
गंगा किनारे केवट ने चरण धोकर भगवान श्रीराम को कराया पार
श्री रामलीला कमेटी के महासचिव बिजेंद्र सिंह आर्य ने बताया कि वनवास के दौरान भगवान श्रीराम गंगा नदी के किनारे पहुंचते हैं। यहां केवट का प्रसंग प्रस्तुत किया गया।
रामायण की लोकप्रिय कथा के अनुसार, केवट भगवान श्रीराम के चरण धोने की इच्छा व्यक्त करता है। इसके बाद वह उन्हें गंगा नदी पार कराता है। यह प्रसंग भगवान श्रीराम और उनके भक्त के बीच श्रद्धा, प्रेम और समर्पण को दर्शाता है।
मंचन के दौरान केवट की भक्ति और भगवान श्रीराम के सहज व्यवहार को प्रस्तुत किया गया। इस प्रसंग के माध्यम से यह संदेश सामने आया कि भक्ति में पद, प्रतिष्ठा और सामाजिक भेदभाव से अधिक महत्व प्रेम और समर्पण का होता है।
गंगा पार करने के बाद भगवान श्रीराम भारद्वाज ऋषि का आशीर्वाद लेते हैं और आगे वन की ओर प्रस्थान करते हैं। वनगमन के इन दृश्यों ने रामलीला की कथा को आगे बढ़ाया।

भरत को श्रीराम के वनवास की जानकारी मिली, मनाने वन पहुंचे

उधर, भरत के अयोध्या लौटने का प्रसंग मंचित किया गया। अयोध्या पहुंचने पर जब उन्हें भगवान श्रीराम के वनवास की जानकारी मिलती है, तो वे दुखी और नाराज हो जाते हैं।
मंचन में भरत का माता कैकयी के प्रति आक्रोश दिखाया गया। वे इस निर्णय को लेकर अपनी नाराजगी व्यक्त करते हैं और भगवान श्रीराम को वापस अयोध्या लाने के उद्देश्य से वन की ओर जाते हैं।
भरत का यह प्रसंग भाईचारे, त्याग और पारिवारिक प्रेम का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है। भरत के लिए राजगद्दी से अधिक महत्व भगवान श्रीराम के प्रति सम्मान और उनके साथ संबंध का है।
रामायण की कथा में भरत का चरित्र सत्ता के प्रति मोह के बजाय कर्तव्य और प्रेम को महत्व देने का संदेश देता है। इसी कारण यह प्रसंग दर्शकों के लिए भावनात्मक और प्रेरणादायक बना रहा।

21 वर्षों से रामलीला का आयोजन कर रही है कमेटी

हर वर्ष मंचन में कुछ नया दिखाने का प्रयास
श्री रामलीला कमेटी के मीडिया प्रभारी विनोद कसाना ने बताया कि कमेटी पिछले 21 वर्षों से विजय महोत्सव के अंतर्गत रामलीला मंचन कार्यक्रम आयोजित कर रही है।
उन्होंने बताया कि कमेटी प्रत्येक वर्ष मंचन में कुछ नया प्रस्तुत करने का प्रयास करती है। इस बार भी दर्शकों के लिए विशेष तैयारियां की गई हैं।
आयोजकों के अनुसार, रामलीला का उद्देश्य धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत रखना तथा लोगों को रामायण के आदर्शों से जोड़ना है। भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़े प्रसंगों के माध्यम से मर्यादा, त्याग, कर्तव्य, भाईचारे और पारिवारिक मूल्यों का संदेश दिया जाता है।
कमेटी का कहना है कि रामलीला देखने आने वाले लोगों को धार्मिक मंचन के साथ मनोरंजन और मेले का अनुभव भी मिल रहा है।

रामलीला परिसर में मेले के आकर्षण, बच्चों के लिए मनोरंजन की व्यवस्था

मीडिया प्रभारी विनोद कसाना के अनुसार, इस बार रामलीला परिसर में नगरवासियों के लिए मेला भी लगाया गया है। मेले में खाने-पीने के स्टॉल और घरेलू उपयोग के सामान की दुकानें लगाई गई हैं।
इसके अलावा बच्चों के मनोरंजन के लिए झूले, सर्कस, जादू और अन्य मनोरंजन के साधन उपलब्ध कराए गए हैं। इस व्यवस्था के माध्यम से परिवारों को रामलीला के साथ मेले का आनंद लेने का अवसर मिल रहा है।
आयोजकों ने बताया कि मेले में आने वाले लोगों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए विभिन्न व्यवस्थाएं की गई हैं। उनका कहना है कि इस बार सुरक्षा के लिए पुलिस और प्रशासन की अच्छी व्यवस्था की गई है।
हालांकि, सुरक्षा व्यवस्था के संबंध में किसी स्वतंत्र आधिकारिक विवरण का उल्लेख प्रेस विज्ञप्ति में नहीं किया गया है। इसलिए इसे आयोजकों की ओर से दी गई जानकारी के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

आगामी लीला में नारद-सूपर्णखा संवाद और सीता हरण का मंचन

संयुक्त महासचिव सौरभ बंसल ने आगामी कार्यक्रम की जानकारी देते हुए बताया कि आगे की रामलीला में नारद-सूपर्णखा संवाद, सीता हरण, राम वियोग और जटायु मरण जैसी लीलाओं का मंचन किया जाएगा।
इन प्रसंगों में रामायण की कथा एक नए मोड़ पर पहुंचेगी। सीता हरण के बाद भगवान श्रीराम की खोज यात्रा, जटायु का संघर्ष और भगवान श्रीराम का विरह आगे की कथा के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।

कमेटी के पदाधिकारी और सदस्य रहे उपस्थित

रामलीला मंचन के अवसर पर कमेटी के अध्यक्ष मनजीत सिंह, महासचिव बिजेंद्र सिंह आर्य, कोषाध्यक्ष मनोज गर्ग, संयुक्त महासचिव सौरभ बंसल और मीडिया प्रभारी विनोद कसाना सहित कई पदाधिकारी एवं सदस्य उपस्थित रहे।
इनके अलावा धर्मपाल भाटी, कुलदीप शर्मा, मुकेश शर्मा, केके शर्मा, हरेन्द्र भाटी, मुकुल गोयल, सुभाष चंदेल, अमित गोयल, अतुल जिंदल, गिरीश जिंदल, श्यामवीर भाटी, मनोज यादव, सुभाष, अनिल कसाना, सुनील प्रधान, अनुज उपाध्याय, अतुल जैन, अरुण गुप्ता, अंकुर गर्ग, विशाल जैन, दीपक भाटी, राहुल नंबरदार, प्रभाकर देशमुख, विकास आर्य, रिंकू आर्य और प्रमोद मास्टर सहित अन्य सदस्य मौजूद रहे।

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