हनुमान जी ने लंका में मचाया उत्पात, अंगद-रावण संवाद और राम-रावण युद्ध के प्रसंगों ने दर्शकों को किया भावविभोर
सांसद डॉ. महेश शर्मा और विधायक पंकज सिंह सहित अतिथियों की उपस्थिति में श्री धार्मिक रामलीला मंचन ने बांधा समां
ग्रेटर नोएडा। पाई-1 स्थित रामलीला मैदान में आयोजित भव्य रामलीला एवं दशहरा महोत्सव 2026 में सोमवार, 19 अक्टूबर को लंका दहन, रामसेतु निर्माण, अंगद-रावण संवाद और रामायण के युद्ध प्रसंगों का प्रभावशाली मंचन किया गया। कलाकारों की शानदार प्रस्तुति और भगवान श्रीराम के जयकारों से पूरा रामलीला परिसर भक्तिमय हो उठा। बड़ी संख्या में पहुंचे दर्शकों ने रामलीला का आनंद लिया और कलाकारों के अभिनय की सराहना की।
श्री धार्मिक रामलीला समिति की ओर से आयोजित यह महोत्सव 11 अक्टूबर से 20 अक्टूबर 2026 तक प्रतिदिन शाम 7 बजे से आयोजित किया जा रहा है। कार्यक्रम में गौतमबुद्ध नगर के सांसद डॉ. महेश शर्मा, नोएडा के विधायक पंकज सिंह और अंतरराष्ट्रीय कथावाचक अतुल कृष्ण भारद्वाज सहित अन्य अतिथियों की उपस्थिति रही। आयोजन का उद्देश्य धार्मिक परंपराओं को जीवंत बनाए रखने के साथ नई पीढ़ी को भगवान श्रीराम के आदर्शों, मर्यादा और धर्म के महत्व से परिचित कराना है।
हनुमान जी के लंका दहन से लेकर रामसेतु निर्माण तक का भव्य मंचन
संस्था के अध्यक्ष आनंद भाटी ने बताया कि रामलीला में माता सीता की खोज में लंका पहुंचे हनुमान जी से जुड़े प्रसंगों का जीवंत मंचन किया गया। अशोक वाटिका में माता सीता से भेंट करने के बाद हनुमान जी को भूख लगती है। इसके बाद वह रावण की वाटिका में फल खाते हैं और वाटिका को उजाड़ने लगते हैं। लंका के सैनिक उन्हें रोकने का प्रयास करते हैं, लेकिन हनुमान जी के पराक्रम के सामने टिक नहीं पाते।
इस दौरान रावण के पुत्र अक्षय कुमार सहित कई योद्धा हनुमान जी से युद्ध करते हुए मारे जाते हैं। इसके बाद मेघनाद हनुमान जी को ब्रह्मास्त्र के बंधन में बांधकर रावण के दरबार में ले जाता है। वहां रावण और हनुमान जी के बीच संवाद होता है। रावण क्रोधित होकर हनुमान जी की पूंछ में आग लगाने का आदेश देता है।
राक्षस हनुमान जी की पूंछ पर कपड़ा और तेल लगाते जाते हैं, लेकिन उनकी पूंछ लगातार बढ़ती जाती है। आखिरकार पूंछ में आग लगा दी जाती है। इसके बाद हनुमान जी लंका के विभिन्न हिस्सों में पहुंचकर आग लगा देते हैं। देखते ही देखते सोने की लंका में आग की लपटें उठने लगती हैं। लंका दहन के इस दृश्य ने दर्शकों में विशेष उत्साह पैदा किया।
कलाकारों की प्रस्तुति, प्रकाश व्यवस्था और युद्ध के दृश्यों ने मंचन को आकर्षक बनाया।
लंका दहन के बाद हनुमान जी समुद्र पार कर माता सीता के पास पहुंचते हैं और उनसे विदा लेते हैं। माता सीता की चूड़ामणि को पहचान के प्रतीक के रूप में लेकर वह भगवान श्रीराम के पास लौटते हैं और उन्हें माता सीता का संदेश देते हैं। इस प्रसंग में हनुमान जी की भक्ति, साहस और प्रभु श्रीराम के प्रति समर्पण को प्रमुखता से दर्शाया गया।
इसके बाद भगवान श्रीराम अपनी वानर सेना के साथ समुद्र तट पर पहुंचते हैं। माता सीता को रावण की कैद से मुक्त कराने के लिए लंका तक पहुंचना आवश्यक था। भगवान श्रीराम पहले समुद्र से मार्ग देने की प्रार्थना करते हैं। जब प्रार्थना के बाद भी रास्ता नहीं मिलता, तो वह कठोर निर्णय लेने के लिए धनुष उठाते हैं। इसके बाद समुद्र देव प्रकट होकर उन्हें समुद्र पर पुल बनाने का उपाय बताते हैं।
वानर सेना नल-नील के सहयोग से रामसेतु का निर्माण करती है। सेतु तैयार होने के बाद भगवान श्रीराम की सेना समुद्र पार कर लंका की ओर बढ़ती है। इस प्रसंग के माध्यम से एकता, सहयोग, धैर्य और लक्ष्य के प्रति समर्पण का संदेश दिया गया। दर्शकों ने रामसेतु निर्माण के मंचन पर जय श्रीराम के उद्घोष के साथ उत्साह व्यक्त किया।
अंगद-रावण संवाद और युद्ध प्रसंगों ने दिया धर्म की विजय का संदेश
रामसेतु निर्माण के बाद भगवान श्रीराम रावण को अंतिम अवसर देने के लिए अंगद को दूत बनाकर उसके दरबार में भेजते हैं। अंगद रावण को समझाते हैं कि वह माता सीता को सम्मानपूर्वक भगवान श्रीराम को लौटा दे और युद्ध का रास्ता छोड़ दे। हालांकि, रावण अपने अहंकार के कारण उनकी बात मानने से इनकार कर देता है।
मंचन में अंगद की निर्भीकता और रावण के अहंकार को प्रभावशाली ढंग से दिखाया गया। अंगद अपना पैर दरबार में जमा देते हैं और चुनौती देते हैं कि यदि कोई योद्धा उनका पैर हटा दे, तो श्रीराम की सेना वापस लौट जाएगी। दरबार में मौजूद योद्धा अंगद का पैर हिलाने में भी असफल रहते हैं। जब रावण स्वयं आगे बढ़ता है, तब अंगद उसे समझाते हैं कि उसे उनके पैरों में गिरने के बजाय भगवान श्रीराम के चरणों में जाकर क्षमा मांगनी चाहिए।
इसके बाद अंगद वापस भगवान श्रीराम के पास लौटते हैं और बताते हैं कि रावण संधि के लिए तैयार नहीं है। इस प्रकार युद्ध का मार्ग खुल जाता है। रामलीला में लंका के योद्धाओं और भगवान श्रीराम की सेना के बीच युद्ध के विभिन्न प्रसंग प्रस्तुत किए गए।
युद्ध के प्रसंगों में मेघनाद और लक्ष्मण के बीच हुए भीषण संघर्ष को दर्शाया गया। अंततः लक्ष्मण जी मेघनाद का वध करते हैं। इसके बाद रावण अपने भाई कुंभकरण को युद्ध के लिए भेजता है। कुंभकरण अपनी विशाल काया और शक्ति के बल पर राम की सेना को चुनौती देता है, लेकिन भगवान श्रीराम के हाथों उसका अंत होता है।
इसके बाद रावण स्वयं युद्धभूमि में उतरता है। भगवान श्रीराम और रावण के बीच भीषण युद्ध का मंचन किया जाता है। रावण अपनी शक्ति और अस्त्र-शस्त्रों से मुकाबला करता है, जबकि भगवान श्रीराम धर्म और न्याय की रक्षा के लिए युद्ध करते हैं। अंततः भगवान श्रीराम रावण का वध करते हैं। इस प्रसंग के माध्यम से दर्शकों को संदेश दिया गया कि अहंकार, अन्याय और अधर्म चाहे कितने ही शक्तिशाली क्यों न हों, अंततः सत्य और धर्म की विजय होती है।
रामलीला के इन दृश्यों ने दर्शकों को रामायण के उन प्रसंगों से जोड़ा, जिनमें साहस, कर्तव्य, मर्यादा, त्याग और धर्म की स्थापना का संदेश निहित है। पूरे परिसर में भगवान श्रीराम और माता सीता के जयकारे गूंजते रहे। बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों ने उत्साह के साथ कार्यक्रम का आनंद लिया।
धार्मिक परंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों को आगे बढ़ाने का प्रयास
संस्था के अध्यक्ष आनंद भाटी ने कहा कि श्री धार्मिक रामलीला का आयोजन परम पूज्य गोस्वामी सुशील जी महाराज के दिशा-निर्देशन और उनके मार्गदर्शन में किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि रामलीला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह समाज को अच्छे संस्कार देने और भारतीय संस्कृति से जोड़ने का महत्वपूर्ण अवसर भी है।
उन्होंने बताया कि इस वर्ष का रामलीला एवं दशहरा महोत्सव क्षेत्रवासियों के लिए आनंददायक और यादगार आयोजन बनाने का प्रयास किया गया है। आयोजन के माध्यम से नई पीढ़ी को भगवान श्रीराम के आदर्शों, माता सीता की मर्यादा, हनुमान जी की भक्ति और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है।
समिति की ओर से 20 अक्टूबर को महोत्सव के समापन
कार्यक्रम को लेकर भी क्षेत्रवासियों में उत्साह है। आयोजन में धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक एकजुटता और सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है।
समिति के पदाधिकारी और सदस्य रहे उपस्थित
कार्यक्रम में संस्था के संस्थापक गोस्वामी सुशील जी महाराज, संस्थापक राजकुमार नागर, प्रदीप शर्मा, शेर सिंह भाटी और हरवीर मावी उपस्थित रहे। मुख्य संरक्षक नरेश गुप्ता तथा संरक्षक सुशील नागर, धीरेंद्र भाटी, धीरज शर्मा, बालकिशन सफीपुर, दिनेश गुप्ता, पवन नागर, मनोज गुप्ता और सतीश भाटी भी आयोजन से जुड़े रहे।
समिति के अध्यक्ष आनंद भाटी, महासचिव ममता तिवारी, कोषाध्यक्ष अजय नागर, वरिष्ठ उपाध्यक्ष महेश शर्मा बदौली, उमेश गौतम, सत्यवीर मुखिया, रोशनी सिंह, महेश कमांडो, चैन पाल प्रधान, जितेंद्र भाटी, सुभाष भाटी, मनीष डाबर, मीडिया प्रभारी अतुल आनंद, उपाध्यक्ष फिरे प्रधान और पी.पी. शर्मा उपस्थित रहे।
इसके अलावा श्याम सुंदर फौजी, यशपाल नागर, सचिव ज्योति सिंह, गीता सागर, राकेश भाटी, भगवत भाटी, तेज कुमार भाटी, सुंदर भाटी, पवन भाटी, वीरपाल मावी और जय शर्मा सहित समिति के अन्य सदस्य भी मौजूद रहे।
श्री धार्मिक रामलीला समिति का यह आयोजन धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक परंपरा और सामाजिक सहभागिता का संगम बन रहा है। रामलीला के मंचन के जरिए लोगों को यह संदेश दिया जा रहा है कि जीवन में सत्य, मर्यादा और धर्म का मार्ग ही स्थायी महत्व रखता है। जय श्रीराम के उद्घोष के बीच रामलीला परिसर का माहौल भक्तिमय बना रहा।


