99.97% ‘हेयरकट’ पर कर्जदाताओं ने उठाए सवाल, कई बड़े बैंकों ने किया विरोध
80.81% वोट के आधार पर repayment plan मंजूर, अपील की तैयारी में कुछ lenders
नई दिल्ली। सुभाष चंद्र NCLT मामले में National Company Law Tribunal (NCLT) के फैसले के बाद कॉरपोरेट और बैंकिंग क्षेत्र में बहस तेज हो गई है। NCLT ने Zee Group के संस्थापक और Essel Group के चेयरमैन सुभाष चंद्र से जुड़े व्यक्तिगत दिवालियापन मामले में repayment plan को मंजूरी दे दी है।
इस योजना के तहत करीब ₹22,006.57 करोड़ के admitted creditor claims के मुकाबले लगभग ₹6.5 करोड़ का भुगतान प्रस्तावित है। इस आधार पर कर्जदाताओं के लिए करीब 99.97 प्रतिशत का ‘हेयरकट’ बनता है। हालांकि, मामले की कानूनी स्थिति को केवल इतनी बड़ी राशि की ‘कर्जमाफी’ के तौर पर देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता।
सुभाष चंद्र का कहना है कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से किसी lender से कर्ज नहीं लिया था। उनका कहना है कि कई मामलों में वह कंपनियों के personal guarantor थे। वहीं, HDFC Bank, LIC Housing Finance समेत कई कर्जदाताओं ने repayment plan पर आपत्ति जताई है।
सुभाष चंद्र NCLT मामले में क्या हुआ?
NCLT की दिल्ली बेंच में इस मामले पर पहले दो सदस्यों की राय अलग-अलग थी। इसके बाद मामले को तीसरे सदस्य के पास भेजा गया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार Judicial Member Nilesh Sharma ने 25 अगस्त 2026 को Insolvency and Bankruptcy Code की Section 114 के तहत repayment plan को मंजूरी दी।
NCLT के आदेश के अनुसार योजना को पर्याप्त voting support मिला। उपलब्ध विवरण में करीब 80.81 प्रतिशत voting share के समर्थन के आधार पर योजना को मंजूरी दिए जाने की बात सामने आई है।
ट्रिब्यूनल के सामने dissenting creditors की ओर से भी आपत्तियां रखी गई थीं। हालांकि, NCLT ने इन आपत्तियों के बावजूद repayment plan को मंजूरी दी।
NCLT ने repayment plan क्यों मंजूर किया?
सुभाष चंद्र NCLT मामले में ट्रिब्यूनल के फैसले का एक महत्वपूर्ण आधार उनकी व्यक्तिगत संपत्तियों का valuation रहा। NCLT के आदेश में दर्ज valuation के अनुसार सुभाष चंद्र की व्यक्तिगत संपत्ति की कीमत प्रस्तावित repayment से भी कम थी।
ऐसी स्थिति में ट्रिब्यूनल ने माना कि यदि repayment plan को खारिज कर उन्हें bankruptcy की प्रक्रिया में भेजा जाता है, तो जरूरी नहीं कि कर्जदाताओं को इससे बेहतर recovery मिल पाए।
यानी NCLT ने उपलब्ध recovery की वास्तविक संभावना को भी ध्यान में रखा।
ट्रिब्यूनल ने यह भी माना कि उसे creditors की commercial wisdom की जगह अपनी राय नहीं रखनी चाहिए। साथ ही, tribunal अपने स्तर पर repayment amount को पर्याप्त या अपर्याप्त घोषित करने की भूमिका भी नहीं निभा सकता।
₹22,006 करोड़ और ₹6.5 करोड़ के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों?
इस मामले में सबसे ज्यादा चर्चा ₹22,006.57 करोड़ के admitted claims और करीब ₹6.5 करोड़ के प्रस्तावित भुगतान को लेकर हो रही है।
पहली नजर में दोनों आंकड़ों के बीच का अंतर बेहद बड़ा है। इसी वजह से करीब 99.97 प्रतिशत के ‘haircut’ को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
हालांकि, यहां admitted claims और व्यक्तिगत तौर पर लिए गए कर्ज के बीच अंतर समझना जरूरी है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार ₹22,006.57 करोड़ का आंकड़ा insolvency proceedings में सुभाष चंद्र के खिलाफ स्वीकार किए गए creditor claims से संबंधित है।
इन दावों का बड़ा हिस्सा उन कंपनियों के कर्ज से जुड़ा है, जिनके लिए सुभाष चंद्र ने personal guarantees दी थीं।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि ₹22,006 करोड़ की पूरी राशि सुभाष चंद्र ने व्यक्तिगत रूप से बैंकों से उधार ली थी।
सुभाष चंद्र ने क्या कहा?
फैसले के बाद सुभाष चंद्र की ओर से भी अपनी स्थिति स्पष्ट की गई है। उन्होंने कहा है कि उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर किसी lender से पैसा उधार नहीं लिया।
उनके अनुसार dissenting creditors का वास्तविक दावा करीब ₹3,992 करोड़ है। उन्होंने दावा किया कि इसमें से लगभग ₹620 करोड़ पहले ही settle किए जा चुके हैं।
इसके अलावा, उनका कहना है कि borrowing entities की ओर से लगभग ₹1,063 करोड़ की राशि देने की पेशकश की गई है।
सुभाष चंद्र ने यह भी दावा किया कि जिन कंपनियों के लिए उन्होंने guarantee दी थी, वे अब तक lenders को करीब ₹43,000 करोड़ का भुगतान कर चुकी हैं। उनके अनुसार बाकी देनदारियों को भी संबंधित borrowing companies की ओर से निपटाया जाएगा।
इन दावों और आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि इस समाचार में उपलब्ध सामग्री के आधार पर नहीं की जा रही है।
HDFC Bank और LIC Housing Finance समेत कई lenders ने किया विरोध
सुभाष चंद्र NCLT मामले में repayment plan को सभी creditors का समर्थन नहीं मिला। HDFC Bank, LIC Housing Finance, Axis Bank, Canara Bank, RBL Bank और Union Bank समेत कई lenders ने योजना का विरोध किया।
LIC Housing Finance ने विशेष रूप से repayment को लेकर आपत्ति जताई। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक उसके करीब ₹1,322.39 करोड़ के admitted claim के मुकाबले repayment plan में सिर्फ लगभग ₹38 लाख की राशि प्रस्तावित थी।
यानी lender के admitted claim की तुलना में प्रस्तावित भुगतान बेहद कम था। इसी वजह से repayment plan को लेकर कर्जदाताओं की चिंताएं सामने आईं।
दूसरी ओर, योजना के पक्ष में मतदान करने वाले creditors के पास पर्याप्त voting share था। इसी voting support को NCLT के फैसले में महत्वपूर्ण आधार माना गया।
Voting में किसका समर्थन मिला?
NCLT के आदेश में दर्ज आंकड़ों के अनुसार World Crest Advisors, Lemonade Capital Advisors LLP, Catalyst Trusteeship और Corpcall Capital Advisors सहित कई creditors ने repayment plan के पक्ष में मतदान किया।
उपलब्ध विवरण के अनुसार World Crest Advisors की voting share करीब 28.49 प्रतिशत और Lemonade Capital Advisors की करीब 16.85 प्रतिशत थी।
दिए गए आंकड़ों के मुताबिक करीब 77.48 प्रतिशत total voting share योजना के पक्ष में था। वहीं लगभग 18.42 प्रतिशत ने विरोध किया और 4.10 प्रतिशत ने मतदान नहीं किया।
वहीं, मामले के दूसरे हिस्से में करीब 80.81 प्रतिशत voting share के आधार पर योजना को मंजूरी दिए जाने का उल्लेख है। इसलिए voting के अलग-अलग आंकड़े संबंधित voting calculation या order के अलग-अलग संदर्भों से जुड़े हो सकते हैं।
कुछ dissenting creditors ने यह सवाल भी उठाया कि योजना के पक्ष में मतदान करने वाली कुछ entities का सुभाष चंद्र से संबंध हो सकता है। हालांकि, NCLT ने उपलब्ध तथ्यों के आधार पर उन्हें कानून के तहत ‘associate’ साबित करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना और उनके voting rights को स्वीकार किया।
कांग्रेस ने फैसले पर उठाए सवाल
NCLT के फैसले के बाद राजनीतिक प्रतिक्रिया भी सामने आई। कांग्रेस महासचिव Jairam Ramesh ने केंद्र सरकार और NCLT पर निशाना साधते हुए फैसले की आलोचना की।
उन्होंने ₹22,006 करोड़ के दावे के मुकाबले करीब ₹6.5 करोड़ के भुगतान को लेकर ‘haircut’ शब्द पर सवाल उठाया और इसे ‘mundan’ तक बताया।
कांग्रेस नेता Rahul Gandhi ने भी इस मामले को लेकर सरकार पर आरोप लगाए। उन्होंने आरोप लगाया कि देश में आम लोगों और चुनिंदा बड़े उद्योगपतियों के लिए अलग-अलग व्यवस्था दिखाई देती है।
ये राजनीतिक आरोप हैं। इन्हें स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। सरकार की ओर से इस मामले पर उपलब्ध सामग्री में अलग प्रतिक्रिया का उल्लेख नहीं है।
क्या ₹22 हजार करोड़ का कर्ज माफ हो गया?
यही सुभाष चंद्र NCLT मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू है।
NCLT का फैसला सीधे तौर पर यह नहीं कहता कि ₹22,006 करोड़ की पूरी राशि सुभाष चंद्र का व्यक्तिगत कर्ज था और उसे माफ कर दिया गया।
मामला personal guarantor के तौर पर उनकी insolvency proceedings से जुड़ा है। मूल borrowing companies और उनके खिलाफ lenders के recovery rights अलग कानूनी ढांचे में बने रह सकते हैं।
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार repayment plan में सुभाष चंद्र की ओर से करीब ₹6.25 करोड़ का व्यक्तिगत contribution है। इसके अलावा borrowing companies की ओर से लगभग ₹1,494 करोड़ का अलग भुगतान प्रस्तावित बताया गया है।
इसलिए पूरे मामले को केवल ‘₹22 हजार करोड़ की कर्जमाफी’ कहना कानूनी स्थिति की पूरी तस्वीर नहीं देता।
हालांकि, personal guarantor से मिलने वाली प्रस्तावित राशि बेहद कम होने के कारण कर्जदाताओं की आपत्तियां और सवाल महत्वपूर्ण बने हुए हैं।
कुछ lenders फैसले के खिलाफ कर सकते हैं अपील
NCLT के आदेश के बाद मामला पूरी तरह समाप्त होता दिखाई नहीं दे रहा है। HDFC Bank और LIC Housing Finance समेत कुछ lenders इस फैसले को चुनौती देने की तैयारी में हैं।
Union Bank और Canara Bank की ओर से भी आदेश के खिलाफ appeal किए जाने की बात सामने आई है।
ऐसे में आने वाले समय में उच्च न्यायिक मंचों के सामने repayment plan की वैधता, creditors की voting, personal guarantee और recovery की संभावनाओं से जुड़े मुद्दे उठ सकते हैं।
यदि अपील होती है तो आगे की कानूनी प्रक्रिया यह स्पष्ट कर सकती है कि NCLT द्वारा repayment plan को मंजूरी देने के लिए अपनाए गए आधारों को उच्च मंच किस नजरिए से देखते हैं।
Personal guarantor insolvency के लिए क्यों महत्वपूर्ण है मामला?
सुभाष चंद्र NCLT मामला केवल एक कारोबारी से जुड़ा व्यक्तिगत insolvency case नहीं है। यह personal guarantor की जिम्मेदारी और creditors की recovery के बीच संतुलन से जुड़ा महत्वपूर्ण उदाहरण भी बन सकता है।
एक तरफ lenders का उद्देश्य अधिकतम संभव recovery करना होता है। दूसरी तरफ insolvency कानून में यह भी देखा जाता है कि debtor की वास्तविक संपत्ति और भुगतान क्षमता कितनी है।
यदि debtor की व्यक्तिगत संपत्ति प्रस्तावित भुगतान से भी कम हो, तो bankruptcy के बजाय उपलब्ध repayment plan creditors के लिए ज्यादा व्यावहारिक हो सकता है। NCLT के फैसले में इसी तरह की सोच महत्वपूर्ण दिखाई देती है।
दूसरी ओर, creditors का तर्क यह हो सकता है कि admitted claims की तुलना में बेहद कम repayment को स्वीकार करने से recovery framework पर व्यापक सवाल खड़े होते हैं।
इसी अंतर की वजह से यह मामला आगे भी कानूनी और वित्तीय बहस का विषय बना रह सकता है।
आगे क्या हो सकता है?
फिलहाल NCLT ने repayment plan को मंजूरी दे दी है। लेकिन कई प्रमुख lenders की आपत्तियों और संभावित appeals के कारण इस मामले की कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।
आने वाले समय में अदालतों के सामने यह सवाल महत्वपूर्ण रहेगा कि personal guarantor की insolvency में creditors की commercial wisdom, debtor की वास्तविक संपत्ति, voting process और संभावित recovery के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
इस मामले का अंतिम प्रभाव केवल सुभाष चंद्र की व्यक्तिगत insolvency तक सीमित नहीं रह सकता। Personal guarantor से जुड़े दूसरे मामलों में भी इसके कानूनी तर्कों का महत्व हो सकता है।
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर इतना स्पष्ट है कि NCLT ने repayment plan को मंजूरी दे दी है, जबकि कई lenders इस फैसले से संतुष्ट नहीं हैं। इसलिए ₹22,006 करोड़ के admitted claims और करीब ₹6.5 करोड़ के व्यक्तिगत भुगतान के बीच का अंतर आने वाले समय में भी इस मामले की सबसे बड़ी चर्चा बना रहेगा।
नोट: यह समाचार उपलब्ध NCLT आदेश और प्रस्तुत विभिन्न प्रकाशित रिपोर्टों में दी गई जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। राजनीतिक दलों तथा संबंधित पक्षों के आरोप और दावों को उसी रूप में attribution के साथ प्रस्तुत किया गया है।


