बिलासपुर में अवैध कॉलोनियों की शिकायत पर 22 जनवरी 2026 को गठित हुई थी चार सदस्यीय समिति
आदेश में FIR और ध्वस्तीकरण के निर्देश, शिकायतकर्ता ने कार्रवाई में देरी पर उठाए सवाल
ग्रेटर नोएडा। ग्राम बिलासपुर, परगना दनकौर, तहसील सदर क्षेत्र में कथित रूप से विकसित की जा रही अवैध कॉलोनियों के मामले में ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। समाजसेवी प्रवीन कुमार सैन की शिकायत के बाद प्राधिकरण के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (CEO) स्तर से 22 जनवरी 2026 को एक कार्यालय आदेश जारी कर मामले की गहन जांच के लिए चार सदस्यीय समिति गठित की गई थी। आदेश में दोषी पाए जाने वाले लोगों के खिलाफ तत्काल FIR दर्ज कराने, अवैध निर्माण ध्वस्त कराने तथा प्राधिकरण के किसी कर्मचारी की संलिप्तता मिलने पर उसके खिलाफ कठोर विभागीय कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि आदेश जारी हुए लगभग सात महीने बीतने के बावजूद मामले में अपेक्षित प्रभावी कार्रवाई धरातल पर दिखाई नहीं दे रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब प्राधिकरण के सर्वोच्च प्रशासनिक स्तर से जांच और कार्रवाई के स्पष्ट निर्देश जारी किए गए थे, तो अब तक इस मामले में क्या प्रगति हुई है?
प्राधिकरण के आदेश में अवैध कॉलोनियों की शिकायत का उल्लेख
ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के 22 जनवरी 2026 के कार्यालय आदेश में समाजसेवी प्रवीन कुमार सैन द्वारा 16 जनवरी 2026 को भेजे गए शिकायत पत्र का संदर्भ दिया गया है। शिकायत में ग्राम बिलासपुर नगर पंचायत बिलासपुर के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र में कथित तौर पर अवैध बिल्डरों द्वारा कॉलोनियां काटे जाने की बात कही गई थी।
आदेश में दर्ज विवरण के अनुसार, संबंधित भूमि ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के विकास क्षेत्र के लिए अधिसूचित है। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि कुछ बिल्डर या कॉलोनाइजर बिना प्राधिकरण की अनुमति के जमीन पर कॉलोनियां विकसित कर रहे हैं और पेड़ों को काटकर भी निर्माण गतिविधियां की जा रही हैं।
प्राधिकरण ने शिकायत को गंभीरता से लेते हुए मामले की गहन जांच कराने का निर्णय लिया था।
चार सदस्यीय समिति को सौंपी गई थी जांच की जिम्मेदारी
मामले की जांच के लिए प्राधिकरण के आदेश में चार सदस्यीय समिति का गठन किया गया। समिति में श्रीमती प्रेरणा सिंह, अपर मुख्य कार्यपालक अधिकारी को अध्यक्ष बनाया गया।
समिति के अन्य सदस्यों में श्री सुमित यादव, अपर मुख्य कार्यपालक अधिकारी, श्री ए.के. सिंह, महाप्रबंधक (परियोजना) तथा श्री नागेंद्र सिंह, वरिष्ठ प्रबंधक (परियोजना) को शामिल किया गया। नागेंद्र सिंह को समिति का सदस्य सचिव बनाया गया था।
इस तरह प्राधिकरण ने वरिष्ठ अधिकारियों को शामिल करते हुए मामले की जांच की जिम्मेदारी तय की थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि शिकायत को सामान्य शिकायत के बजाय गंभीर प्रकृति का मामला मानते हुए जांच की प्रक्रिया शुरू की गई थी।
आदेश में FIR और ध्वस्तीकरण के स्पष्ट निर्देश
कार्यालय आदेश का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि समिति को केवल जांच तक सीमित नहीं रखा गया था। आदेश में निर्देश दिया गया था कि प्रकरण की गहनता से जांच करते हुए दोषी व्यक्तियों के खिलाफ तत्काल FIR दर्ज कराना सुनिश्चित किया जाए।
इसके साथ ही कथित अवैध निर्माण को ध्वस्त कराने की कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए गए थे। यानी जांच के बाद दोषियों और अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई की जिम्मेदारी भी स्पष्ट रूप से तय की गई थी।
आदेश में यह भी कहा गया था कि यदि मामले में प्राधिकरण के किसी कर्मचारी की संलिप्तता सामने आती है तो संबंधित कर्मचारी की जिम्मेदारी निर्धारित करते हुए उसके खिलाफ कठोर विभागीय कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।
आदेश के बाद कार्रवाई को लेकर शिकायतकर्ता ने उठाए सवाल

समाजसेवी प्रवीन कुमार सैन का कहना है कि कार्यालय आदेश जारी होने के बाद पर्याप्त समय बीत चुका है, लेकिन अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि जांच समिति ने अपनी जांच किस स्तर तक पूरी की है और उसके आधार पर क्या कार्रवाई की गई।
उन्होंने सवाल उठाया है कि यदि प्राधिकरण ने चार वरिष्ठ अधिकारियों की समिति गठित कर दी थी और FIR तथा ध्वस्तीकरण के स्पष्ट निर्देश दिए थे, तो फिर अब तक कार्रवाई की स्थिति सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
उनका कहना है कि प्राधिकरण को यह स्पष्ट करना चाहिए कि जांच समिति ने क्या रिपोर्ट तैयार की, किन स्थानों पर अवैध निर्माण पाया गया और संबंधित लोगों के खिलाफ क्या कदम उठाए गए।
अधिकारियों की मिलीभगत का आरोप, स्वतंत्र पुष्टि जरूरी
प्रवीन कुमार सैन ने मामले में कुछ जिम्मेदार अधिकारियों और कथित अवैध कॉलोनी विकसित करने वालों के बीच मिलीभगत का आरोप भी लगाया है। हालांकि, इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए आरोपों की निष्पक्ष जांच और संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना जरूरी है।
यदि जांच में किसी अधिकारी या कर्मचारी की संलिप्तता सामने आती है, तो प्राधिकरण के अपने आदेश के अनुसार संबंधित व्यक्ति की जिम्मेदारी तय कर विभागीय कार्रवाई की जानी चाहिए। वहीं यदि आरोप निराधार पाए जाते हैं तो जांच के माध्यम से स्थिति भी स्पष्ट होनी चाहिए।
आदेश के अनुपालन पर उठ रहे हैं कई अहम सवाल
इस पूरे मामले में अब सबसे बड़ा सवाल 22 जनवरी 2026 के आदेश के अनुपालन को लेकर है। आखिर जांच समिति ने अब तक क्या कार्रवाई की? क्या समिति की कोई रिपोर्ट तैयार हुई? क्या अवैध कॉलोनियों को चिह्नित किया गया? क्या किसी बिल्डर या कॉलोनाइजर के खिलाफ FIR दर्ज हुई? और क्या किसी अवैध निर्माण पर बुलडोजर चला?
शिकायतकर्ता ने प्राधिकरण से इन सभी सवालों पर स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की है।
प्रमुख सवाल
– 22 जनवरी 2026 को गठित जांच समिति ने अब तक क्या जांच की?
– क्या समिति ने अपनी रिपोर्ट प्राधिकरण को सौंप दी है?
– कितने कथित अवैध निर्माण या कॉलोनियां जांच में चिन्हित हुईं?
– क्या किसी बिल्डर या कॉलोनाइजर के खिलाफ FIR दर्ज की गई?
– क्या किसी अवैध निर्माण के खिलाफ ध्वस्तीकरण की कार्रवाई हुई?
– क्या जांच में किसी प्राधिकरण कर्मचारी की भूमिका सामने आई?
– यदि आदेश का पालन नहीं हुआ तो इसके लिए जिम्मेदार अधिकारी कौन है?
प्राधिकरण की पारदर्शिता से दूर हो सकते हैं सवाल
अवैध कॉलोनियों से जुड़ा मामला केवल जमीन के अनधिकृत उपयोग तक सीमित नहीं है। ऐसे मामलों का असर नियोजित शहरी विकास, सड़क, जल निकासी, बिजली, सीवर और भविष्य की नागरिक सुविधाओं पर भी पड़ सकता है। इसलिए किसी भी शिकायत की समयबद्ध और पारदर्शी जांच महत्वपूर्ण हो जाती है।
विशेष रूप से तब, जब किसी प्राधिकरण के CEO स्तर से जांच समिति गठित कर कार्रवाई के स्पष्ट निर्देश दिए गए हों। ऐसी स्थिति में जांच की प्रगति और अंतिम निर्णय की जानकारी सार्वजनिक किए जाने से लोगों का भरोसा मजबूत हो सकता है।
शिकायतकर्ता ने कार्रवाई और जवाबदेही की मांग की
प्रवीन कुमार सैन ने मांग की है कि ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण 22 जनवरी 2026 के कार्यालय आदेश के अनुपालन की स्थिति स्पष्ट करे। उन्होंने कहा कि यदि किसी स्तर पर लापरवाही हुई है तो जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए और यदि अवैध कॉलोनियों की पुष्टि होती है तो आदेश के अनुरूप FIR और ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की जानी चाहिए।
फिलहाल इस मामले में मुख्य सवाल यही है कि जांच समिति गठित होने और कार्रवाई के स्पष्ट आदेश के बाद लगभग सात महीने में प्राधिकरण ने क्या कदम उठाए? अब लोगों की नजर प्राधिकरण की अगली कार्रवाई और जांच की वास्तविक स्थिति पर है।
नोट: इस समाचार में अवैध कॉलोनियों और अधिकारियों की मिलीभगत से संबंधित दावे शिकायतकर्ता के आरोपों एवं उपलब्ध कार्यालय आदेश के आधार पर हैं। संबंधित प्राधिकरण/अधिकारियों का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।


